Wednesday, 8 May 2013

छोड़ दो ए माओं तुम जनना बेटियां


छोड़ दो ए माओं तुम जनना बेटियां
निश्छल, निष्पाप सी, जीवन की उम्मीद देती बेटियां
तुमने दिया वरदान उसे जो, बन रहा अभिशाप है
जननी का अधिकार पाकर, धो रही वो पाप हैं
आंचल में जो दूध दिया है, भेड़ियों की वह भूख बना है
इन दरिंदों के वास्ते तुम, क्यूं जनोगी बेटियां?
छोड़ दो माओं तुम जनना बेटियां
वंश चलाने की खातिर, कोख में मारते हैं बेटियां
हवस की अग्नि में हर रोज, लीलते हैं बेटियां
कभी दहेज, कभी झूठी शान पे, बली चढ़ाते ये बेटियां
दुनिया की हर गलतियों पर दोषी ठहराते बेटियां
बहुत हुआ अब और नहीं, चला लो तुम ये जीवन बिन बेटियां
छोड़ दो ए माओं, अब तुम जनना बेटियां
 
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होता है जब सन्नाटा चहुंओर
सुनती हूं मैं सिसकियों का शोर
दबी सी, कुचली सी वो आवाज
सुन भी ना पाई जिसे मैं ठीक से
वह अन्तर्नाद, दर्द का वह उन्माद 
बेध गई मेरे सीने को वह बार-बार
है कौन वो, कौन है जो पुकार रही हमे हर बार
मेरी आवाज, या तुम्हारे संस्कार
मेरी अस्मिता या तुम्हारा अहंकार
नष्ट हो रही है, जो कुंठित विचारों से
छली जा रही जो, तुम्हारे घिनौने समाजों से
क्यूं नहीं है बर्दास्त तुम्हें, उसका यूं बेखौफ घूमना
हंसना-मुस्कुराना और तुमसे आगे बढ़ जाना
जीत ना पाए जब तुम उसे अपनी अक्ल से
जीतने चले हो उसे अपने बल से
एक दिन ऐसा आएगा, जब तरसोगे तुम उसके सानिध्य को
ना रहेगी जननी तो पाओगे कैसे जन्म तुम
सुनी कलाइयों से दिखाओगे कैसे दंभ तुम
प्रेम से सूनी होगी जिंदगी तुम्हारी
विरह में तड़पोगे तुम भर कर ठंडी आंहे
जीवन के सबसे बड़े पुण्य से रहोगे तुम वंचित
बिन बेटी बाबुल कैसे बन पाओगे तुम


मासिक पत्रिका "दलित दस्तक"के फरवरी अंक में प्रकाशित मेरी कविता। 

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