विश्वास है बदलाव का आधार
मेरे नौकरी की पहली पोस्टिंग इत्तेफाक से मेरे गांव केवरा में हुई थी. वैसे तो ये गांव मेरा पुश्तैनी ही था, परंतु सालों से यहां कोई रहता नहीं था. हम सब उत्तर प्रदेश के बलिया में रहते थे. चूंकि शहर से गांव तकरीबन 22 किलोमीटर दूर है इसलिए रोज आने-जाने की बजाय मैने वहीं रहने की सोची. गांव का घर, घर से बड़ा आंगन, और आंगन से बड़ा दुआर. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इतने बड़े घर को कैसे संभालूंगी. उसकी साफ-सफाई, घर के काम-काज, उस पर से मेरी नौकरी. उन दिनों मेरी तबियत भी ज्यादा ठीक नहीं रहती थी. मुझे स्पॉन्डलाइटिस की शिकायत शुरू हो गई थी और मैं काफी परेशान रहती थी. मेरा बायां हाथ अक्सर सुन्न पर जाया करता था और मैं ज्यादा कुछ कर नहीं पाती थी. मैने सोचा कि किसी को मदद के लिए रख लेती हूं, जिससे मुझे सहूलियत हो जाएगी. लेकिन मैं ज्यादा किसी को जानती-पहचानती नहीं थी, इसलिए मैं किसी को ढ़ूंढ़ नहीं पा रही थी. तभी एक दिन मेरे गांव की धोबिन मेरे घर आई. उसकी पांच लड़कियां थी. मैने उससे कहा कि क्या तुम अपनी एक लड़की को मेरे घर मेरी मदद के लिए भेज सकती हो? पहले तो वो कुछ बोली ही नहीं, पर जब मैने उससे दूसरी बार पूछा तो उसने कहा कि मैं घर पर बात कर के बताऊंगी.
मैने सोचा; हो सकता है घर में सबसे राय-मशविरा करना चाहती हो. अगले दिन वो मेरे घर आई तो मैने उसके फैसले के बारे में पूछा. उसने मुझसे कहा- ‘आप ऊंची जात वाले लोग हो और हम नीची जात वाले. हमारी लड़की आपके घर में रहेगी तो आपको कोई परेशानी तो नहीं होगी.’ मेरे लिए यह सवाल अप्रत्याशित था, क्योंकि मैने तो कभी जाति-पाति के बारे में सोचा ही नहीं था, और न मेरे तब तक के जीवन में जाति-पाति-धर्म आदि की बात आई थी. मैं जिस माहौल में पली-पढ़ी थी, वहां कभी ऐसी बातें नहीं होती थी. या फिर यूं कहें कि होती भी होंगी तो मेरे सामने कभी नहीं आई थी. मगर ये गांव था और यहां जाति की बहुत महत्ता थी. इसका नमूना भी मैं देख चुकी थी. एक दिन मुझे स्कूल में प्यास लगी और मैने एक लड़की से पानी मांगा. वो पानी लाने गई तो उधर से स्कूल की रसोइया पानी लेकर आई और मुझसे बोली- ‘आपने उस लड़की से पानी क्यों मांगा?’ मैने पूछा- क्यों क्या गलत किया? तो उसने कहा कि वो छोटी जात की है इसलिए आपको उसके हाथ से पानी नहीं पीनी चाहिए. मुझे बहुत गुस्सा आया. आज के इस आधुनिक युग में भी, वो भी विद्यालय में जहां आप बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी देते हैं, वहां इस तरह के भेदभाव बरते जाते हैं. मैने तो वहां यह तक देखा कि एक शिक्षिका अपना ग्लास खुद लेकर आती थी और उसी ग्लास में पानी पीती थी. मगर मैं इन जाति, धर्म और छुआछूत को नहीं मानती थी. मैने बहुत ही कड़े शब्दों में उस रसोइये से कहा कि मैं जाति-धर्म के भेद को नहीं मानती, इसलिए मैं सभी के हाथ का पानी पीऊंगी.
आज मेरे सामने फिर से धोबिन के रूप में वही सवाल था. मैने उससे भी यही कहा कि आप चिंता ना करो मैं जाति के भेदभाव को नहीं मानती इसलिए मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. धोबिन भी जानती थी कि मैं गांव में कभी नहीं रही हूं. इसलिए वहां के लोगों की तरह नहीं सोचती. मगर मेरे अगल-बगल में तो सारे सवर्णों के घर ही थे. उसने कहा- आपको तो कोई दिक्कत नहीं है पर अगर आपने मेरी लड़की को अपने घर पर रखा तो आपके पट्टीदार (रिश्तेदार) आपके खिलाफ हो जाएंगे. मैने कहा कि आप चिंता न करो, मैं देख लूंगी. उसने मेरा विश्वास किया और अगले दिन से उसकी बेटी प्रियंका मेरे घर मेरी मदद करने आने लगी. शुरू में तो किसी को पता नहीं चला, मगर धीरे-धीरे पास-पड़ोस में सब जान गए कि मैने एक‘छोटी जात’ की लड़की को अपने घर मदद के लिए रखा है. धीरे-धीरे इसका विरोध भी दिखने लगा. कोई आकर कहता कि तुम इस छोटी जात की लड़की से अपने बर्तन धुलवाती हो, हम तुम्हारे बर्तन में नहीं खाएंगे. कोई कहता कि तुम्हें पूरे गांव में मदद के लिए यही मिली थी. कोई कुछ कहता, कोई कुछ. एक दिन मेरी सास आईं. उन्होंने भी मुझे मना किया. कहा कि इसे रसोई का काम मत कराया करो. मगर मैने सभी को सिर्फ एक ही जवाब दिया, ‘मुझे जाति से कोई फर्क नहीं पड़ता. मेरे लिए इसमें और आपलोगों में कोई फर्क नहीं है. जिसे ज्यादा दिक्कत हो, वो मेरे घर ना आए, न खाए-पीये.’ बस;फिर सबकी बोलती बंद हो गई. उसके बाद न किसी ने कभी कोई आवाज उठाई और न ही मेरे घर आना जाना बंद किया. ऐसा नहीं कि विरोध मेरी तरफ ही था, प्रियंका के घरवालों को भी अपनी बिरादरी में विरोध का सामना करना पड़ा. उनलोगों के लिए भी किसी बाहरी व्यक्ति की रसोई में काम करना उनकी बिरादरी के उसूलों के खिलाफ था. मगर उसके घरवालों ने अपनी बिरादरी के खिलाफ जाकर मेरे विश्वास में अपना विश्वास कायम रखा. आज पांच बरस हो गए प्रियंका को मेरे घर काम करते हुए. उसकी जिंदगी में मैं, और मेरी जिंदगी के लिए वो एक सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करते हैं. मैं उसकी सारी जरूरतों का ख्याल रखती हूं और वो मेरी. इस घटना के बाद मैने ये महसूस किया कि कोई भी बदलाव लाने के लिए सबसे पहले आपको सामाजिक और आर्थिक रूप से सृदृढ़ होना पड़ेगा, लेकिन सबसे जरूरी है खुद पर विश्वास।
(मेरा यह आर्टिकल तहलका के मई अंक में प्रकाशित हो चुका है)
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