महिलाओं
के खिलाफ हिंसा करने वाले आरोपियों को कड़ा दंड देने का दम भरने वाला ‘एंटी रेप बिल’ आ चुका है. यह
कानून इसलिए बनाया गया कि महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिल सके. उनके साथ
दुर्व्यवहार बंद हो. मगर यह सोचना कि इस कानून द्वारा स्त्रियों की स्थिति पूरी
तरह बदल जाएगी, गलत होगा. हमारे देश में महिलाओं के
खिलाफ हिंसा रोकने के लिए कई कानून पहले से ही मौजूद है. इसके बावजूद सच्चाई सबके
सामने है. एकबारगी अगर यह मान भी लिया जाए कि इस कानून के डंडे की फटकार से आरोपी
डर जायेंगे लेकिन सरकार उन आरोपियों का क्या करेंगी जो धर्म का आड़ लेकर लगातार
औरतों का शोषण करते रहते हैं. देश में कई ऐसी कुप्रथाएं हैं जो हिन्दू धर्म की आड़
में संभ्रात वर्ग को दलित और पिछड़ी औरतों के शोषण का हक देती है. देवदासी प्रथा
ऐसी ही एक घिनौनी कुप्रथा है. तमाम कानूनों के बावजूद दक्षिण में इस कुप्रथा का खूब
प्रचलन है. ये प्रथा
आन्ध्रप्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक सहित महाराष्ट्र में
ज्यादा फला-बढ़ा है.
सन् 1982 में सरकार ने इस कुप्रथा पर बैन लगा दिया था. 2004 में महाराष्ट्र सरकार ने इसके खिलाफ ‘एंटी देवदासी बिल’ भी पास किया,
मगर इसके बावजूद सामाजिक संगठनों की माने तो ये प्रथा हमारे देश में आज भी
विद्यमान है. शाब्दिक तौर पर ‘देवदासी’ का अर्थ होता है, देवता
(भगवान) की दासी. प्राचीन भारत में कुंवारी लड़कियों की शादी भगवान से कराकर
उन्हें मन्दिर की सेवा करने के लिए दे दिया जाता था. उनका कार्य नृत्य औऱ संगीत
द्वारा भगवान की सेवा करना होता था. लेकिन असल में इनका काम मंदिर के पुजारियों,
गांव के जमींदारों, पैसे और पावर वाले लोगों की कामेच्छा
की पूर्ति करना रह गया. आंकड़ों की बात करें तो तकरीबन साढ़े चार लाख देवदासियां
मजबूरीवश धर्म की आड़ में चलने वाले इस घिनौने खेल में लिप्त हैं. इस प्रथा के पीछे
मुख्य कारण निर्धनता है. देश के दक्षिण
भाग में निर्धन लोग लड़की को एक अतिरिक्त
बोझ के रूप में देखते हैं. उन्हें लगता है कि लड़की के जन्म से उनके घर खाने वालों
की संख्या बढ़ जाएगी इसलिए वे अपनी लड़कियों को इस कुप्रथा की अग्नि में झोंक देते
हैं. इससे जहां उनकी आमदनी
बढ़ जाती है तो वहीं खाने वाले की संख्या भी नहीं बढ़ती. ये प्रथा दलितों में ज्यादा
पाई जाती है क्योंकि इनकी स्थिति समाज में बहुत ही नीचे है और उनमें शिक्षा की कमी
पाई जाती है. अगर वो इस कुप्रथा के भंवर से निकलना चाहे तो उन्हें ऐसी सजा दी जाती
है जिससे कोई दूसरी देवदासी ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सके.
अलग-अलग
जगहों पर इसे अलग-अलग नाम दिया गया है. मसलन आंध्र प्रदेश में इसे जोगिनी, गोवा में भावनिस, तामिलनाडु
में थेवारदियर, महाराष्ट्र में मुरालिस असम में नतिस,
कर्नाटक में बेसविस कहा जाता है. मराठी में तो इनके बारे
में कहा जाता है कि ये दासी तो भगवान की होती है परंतु पत्नी सारे शहर की होती है.
इस तरह की बहुत सी औरते हैं जो आजीवन कुंवारी रहती हैं और भीख मांग कर अपना गुजारा
करती हैं. वो भी आम भिखारियों की तरह नहीं बल्कि एक प्रथा जिसे 'जोगवा' कहते हैं,
उसके तहत. इसमें इनके पैरों में छोटी घंटियां बंधी होती
है. साथ ही भगवान का धातु का बना एक मुखौटा होता है, जिसे सर पर रखकर ये आजीवन भीख
मांगती हैं. कर्नाटक में बूढ़ी देवदासियों को 'जोगति' तथा कम उम्र की देवदासियों को 'बेसवी'
कहा जाता है. 'बेसवी'
शब्द बेसवा नाम के बैल से लिया गया है, जिसका मतलब होता है ऐसा बैल जो पूरे गांव में बिना किसी
रोक-टोक के घूमता है. ‘ओकली’ नाम की ऐसी ही एक कुप्रथा 1987 तक
प्रचलन में थी. यह हिन्दू नववर्ष (गुड़ी पड़वा) के बाद पहले या दूसरे शनिवार को आता
था. इसमें देवदासियों
के साथ सार्वजनिक तौर पर संबंध बनाया जाता था. बाद में इस प्रथा को 'रंगपंचमी' का नाम दे दिया
गया. इस दौरान इस प्रथा के जरिए और ज्यादा फूहड़ता के साथ देवदासियों का शोषण होने
लगा. संभ्रांत परिवार के युवक इसमें शामिल होते थे. ये सब घिनौना खेल 'भगवान बिलि कलप्पा' के नाम पर
होता था. कर्नाटक के एक शहर मदकेरिपुरा में 'सिदि अत्तु' नाम की प्रथा का चलन 1987 तक रहा, जब तक की वहां की
सरकार ने इसे बैन नहीं कर दिया. इस प्रथा के तहत देवदासियों के पीठ में हुक लगाकर मैदान में एक खंभे पर
टांग दिया जाता था. इस दौरान उसके शरीर का अधिकांश हिस्सा दिखता रहता जिससे लोगों का मनोरंजन होता. यह सारा
घिनौना खेल उस शहर की सम्पन्नता के नाम पर किया जाता था. इसके बदले में भीड़ उसे
साड़ी, नारियल और सुपारी देती. प्रथा के मुताबिक सार्वजनिक रूप से इतना अपमान झेलने के
बावजूद उसे लोगों का धन्यवाद करना पड़ता था.
गौर करें
तो हिन्दू धर्म के पुरोधा दलितों एवं पिछड़ों को अपने मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से
तो रोकते हैं लेकिन इस समाज की महिलाओं का भगवान के नाम पर लगातार शोषण करते रहते
हैं. हिन्दू कोड बिल के जरिए भारतीय स्त्रियों की दशा सुधारने की दिशा में नींव रखने
वाले डॉ. आम्बेडकर ने 13 जून, 1936 में मुंबई के परेल स्थित दामोदर हॉल में देवदासियों का एक सम्मेलन आयोजित
किया था. इसमें उन्होंने कहा कि उन्हें इस पाप भरी जिन्दगी को छोड़कर एक सही
जिंदगी जीनी चाहिए, जहां चरित्र पैसे से ज्यादा
महत्वपूर्ण हो. इस दौरान उन्होंने देवदासी प्रथा में लिप्त महिलाओं को बौद्ध धम्म
की दीक्षा देकर उनके परिवार को इस प्रथा से मुक्त किया. हालांकि आज भी देश में कई
राज्य ऐसे हैं, जहां धर्म के नाम पर संभ्रात लोगों
द्वारा पिछड़ी और दलित महिलाओं का शोषण बरकरार है.
मासिक पत्रिका 'दलित दस्तक' के मई अंक में प्रकाशित मेरा आर्टिकल
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