Thursday, 23 May 2013

तहलका में प्रकाशित मेरा आर्टिकल




विश्वास है बदलाव का आधार
मेरे नौकरी की पहली पोस्टिंग इत्तेफाक से मेरे गांव केवरा में हुई थी. वैसे तो ये गांव मेरा पुश्तैनी ही था, परंतु सालों से यहां कोई रहता नहीं था. हम सब उत्तर प्रदेश के बलिया में रहते थे. चूंकि शहर से गांव तकरीबन 22 किलोमीटर दूर है इसलिए रोज आने-जाने की बजाय मैने वहीं रहने की सोची. गांव का घर, घर से बड़ा आंगन, और आंगन से बड़ा दुआर. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इतने बड़े घर को कैसे संभालूंगी. उसकी साफ-सफाई, घर के काम-काज, उस पर से मेरी नौकरी. उन दिनों मेरी तबियत भी ज्यादा ठीक नहीं रहती थी. मुझे स्पॉन्डलाइटिस की शिकायत शुरू हो गई थी और मैं काफी परेशान रहती थी. मेरा बायां हाथ अक्सर सुन्न पर जाया करता था और मैं ज्यादा कुछ कर नहीं पाती थी. मैने सोचा कि किसी को मदद के लिए रख लेती हूं, जिससे मुझे सहूलियत हो जाएगी. लेकिन मैं ज्यादा किसी को जानती-पहचानती नहीं थी, इसलिए मैं किसी को ढ़ूंढ़ नहीं पा रही थी. तभी एक दिन मेरे गांव की धोबिन मेरे घर आई. उसकी पांच लड़कियां थी. मैने उससे कहा कि क्या तुम अपनी एक लड़की को मेरे घर मेरी मदद के लिए भेज सकती हो पहले तो वो कुछ बोली ही नहीं, पर जब मैने उससे दूसरी बार पूछा तो उसने कहा कि मैं घर पर बात कर के बताऊंगी.
मैने सोचा; हो सकता है घर में सबसे राय-मशविरा करना चाहती हो. अगले दिन वो मेरे घर आई तो मैने उसके फैसले के बारे में पूछा. उसने मुझसे कहा- आप ऊंची जात वाले लोग हो और हम नीची जात वाले. हमारी लड़की आपके घर में रहेगी तो आपको कोई परेशानी तो नहीं होगी. मेरे लिए यह सवाल अप्रत्याशित था, क्योंकि मैने तो कभी जाति-पाति के बारे में सोचा ही नहीं था, और न मेरे तब तक के जीवन में जाति-पाति-धर्म आदि की बात आई थी. मैं जिस माहौल में पली-पढ़ी थी, वहां कभी ऐसी बातें नहीं होती थी. या फिर यूं कहें कि होती भी होंगी तो मेरे सामने कभी नहीं आई थी. मगर ये गांव था और यहां जाति की बहुत महत्ता थी. इसका नमूना भी मैं देख चुकी थी. एक दिन मुझे स्कूल में प्यास लगी और मैने एक लड़की से पानी मांगा. वो पानी लाने गई तो उधर से स्कूल की रसोइया पानी लेकर आई और मुझसे बोली- आपने उस लड़की से पानी क्यों मांगा?’ मैने पूछा- क्यों क्या गलत किया? तो उसने कहा कि वो छोटी जात की है इसलिए आपको उसके हाथ से पानी नहीं पीनी चाहिए. मुझे बहुत गुस्सा आया. आज के इस आधुनिक युग में भी, वो भी विद्यालय में जहां आप बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी देते हैं, वहां इस तरह के भेदभाव बरते जाते हैं. मैने तो वहां यह तक देखा कि एक शिक्षिका अपना ग्लास खुद लेकर आती थी और उसी ग्लास में पानी पीती थी. मगर मैं इन जाति, धर्म और छुआछूत को नहीं मानती थी. मैने बहुत ही कड़े शब्दों में उस रसोइये से कहा कि मैं जाति-धर्म के भेद को नहीं मानती, इसलिए मैं सभी के हाथ का पानी पीऊंगी.
आज मेरे सामने फिर से धोबिन के रूप में वही सवाल था. मैने उससे भी यही कहा कि आप चिंता ना करो मैं जाति के भेदभाव को नहीं मानती इसलिए मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. धोबिन भी जानती थी कि मैं गांव में कभी नहीं रही हूं. इसलिए वहां के लोगों की तरह नहीं सोचती. मगर मेरे अगल-बगल में तो सारे सवर्णों के घर ही थे. उसने कहा- आपको तो कोई दिक्कत नहीं है पर अगर आपने मेरी लड़की को अपने घर पर रखा तो आपके पट्टीदार (रिश्तेदार) आपके खिलाफ हो जाएंगे. मैने कहा कि आप चिंता न करो, मैं देख लूंगी. उसने मेरा विश्वास किया और अगले दिन से उसकी बेटी प्रियंका मेरे घर मेरी मदद करने आने लगी. शुरू में तो किसी को पता नहीं चला, मगर धीरे-धीरे पास-पड़ोस में सब जान गए कि मैने एकछोटी जात की लड़की को अपने घर मदद के लिए रखा है. धीरे-धीरे इसका विरोध भी दिखने लगा. कोई आकर कहता कि तुम इस छोटी जात की लड़की से अपने बर्तन धुलवाती हो, हम तुम्हारे बर्तन में नहीं खाएंगे. कोई कहता कि तुम्हें पूरे गांव में मदद के लिए यही मिली थी. कोई कुछ कहता, कोई कुछ. एक दिन मेरी सास आईं. उन्होंने भी मुझे मना किया. कहा कि इसे रसोई का काम मत कराया करो. मगर मैने सभी को सिर्फ एक ही जवाब दिया, मुझे जाति से कोई फर्क नहीं पड़ता. मेरे लिए इसमें और आपलोगों में कोई फर्क नहीं है. जिसे ज्यादा दिक्कत हो, वो मेरे घर ना आए, न खाए-पीये. बस;फिर सबकी बोलती बंद हो गई. उसके बाद न किसी ने कभी कोई आवाज उठाई और न ही मेरे घर आना जाना बंद किया. ऐसा नहीं कि विरोध मेरी तरफ ही था, प्रियंका के घरवालों को भी अपनी बिरादरी में विरोध का सामना करना पड़ा. उनलोगों के लिए भी किसी बाहरी व्यक्ति की रसोई में काम करना उनकी बिरादरी के उसूलों के खिलाफ था. मगर उसके घरवालों ने अपनी बिरादरी के खिलाफ जाकर मेरे विश्वास में अपना विश्वास कायम रखा. आज पांच बरस हो गए प्रियंका को मेरे घर काम करते हुए. उसकी जिंदगी में मैं, और मेरी जिंदगी के लिए वो एक सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करते हैं. मैं उसकी सारी जरूरतों का ख्याल रखती हूं और वो मेरी. इस घटना के बाद मैने ये महसूस किया कि कोई भी बदलाव लाने के लिए सबसे पहले आपको सामाजिक और आर्थिक रूप से सृदृढ़ होना पड़ेगा, लेकिन सबसे जरूरी है खुद पर विश्वास।
(मेरा यह आर्टिकल तहलका के मई अंक में प्रकाशित हो चुका है)

Wednesday, 8 May 2013

छोड़ दो ए माओं तुम जनना बेटियां


छोड़ दो ए माओं तुम जनना बेटियां
निश्छल, निष्पाप सी, जीवन की उम्मीद देती बेटियां
तुमने दिया वरदान उसे जो, बन रहा अभिशाप है
जननी का अधिकार पाकर, धो रही वो पाप हैं
आंचल में जो दूध दिया है, भेड़ियों की वह भूख बना है
इन दरिंदों के वास्ते तुम, क्यूं जनोगी बेटियां?
छोड़ दो माओं तुम जनना बेटियां
वंश चलाने की खातिर, कोख में मारते हैं बेटियां
हवस की अग्नि में हर रोज, लीलते हैं बेटियां
कभी दहेज, कभी झूठी शान पे, बली चढ़ाते ये बेटियां
दुनिया की हर गलतियों पर दोषी ठहराते बेटियां
बहुत हुआ अब और नहीं, चला लो तुम ये जीवन बिन बेटियां
छोड़ दो ए माओं, अब तुम जनना बेटियां
 
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होता है जब सन्नाटा चहुंओर
सुनती हूं मैं सिसकियों का शोर
दबी सी, कुचली सी वो आवाज
सुन भी ना पाई जिसे मैं ठीक से
वह अन्तर्नाद, दर्द का वह उन्माद 
बेध गई मेरे सीने को वह बार-बार
है कौन वो, कौन है जो पुकार रही हमे हर बार
मेरी आवाज, या तुम्हारे संस्कार
मेरी अस्मिता या तुम्हारा अहंकार
नष्ट हो रही है, जो कुंठित विचारों से
छली जा रही जो, तुम्हारे घिनौने समाजों से
क्यूं नहीं है बर्दास्त तुम्हें, उसका यूं बेखौफ घूमना
हंसना-मुस्कुराना और तुमसे आगे बढ़ जाना
जीत ना पाए जब तुम उसे अपनी अक्ल से
जीतने चले हो उसे अपने बल से
एक दिन ऐसा आएगा, जब तरसोगे तुम उसके सानिध्य को
ना रहेगी जननी तो पाओगे कैसे जन्म तुम
सुनी कलाइयों से दिखाओगे कैसे दंभ तुम
प्रेम से सूनी होगी जिंदगी तुम्हारी
विरह में तड़पोगे तुम भर कर ठंडी आंहे
जीवन के सबसे बड़े पुण्य से रहोगे तुम वंचित
बिन बेटी बाबुल कैसे बन पाओगे तुम


मासिक पत्रिका "दलित दस्तक"के फरवरी अंक में प्रकाशित मेरी कविता। 

देवता और देह के बीच पिसती ‘देवदासी’


महिलाओं के खिलाफ हिंसा करने वाले आरोपियों को कड़ा दंड देने का दम भरने वाला एंटी रेप बिल आ चुका है. यह कानून इसलिए बनाया गया कि महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिल सके. उनके साथ दुर्व्यवहार बंद हो. मगर यह सोचना कि इस कानून द्वारा स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी, गलत होगा. हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए कई कानून पहले से ही मौजूद है. इसके बावजूद सच्चाई सबके सामने है. एकबारगी अगर यह मान भी लिया जाए कि इस कानून के डंडे की फटकार से आरोपी डर जायेंगे लेकिन सरकार उन आरोपियों का क्या करेंगी जो धर्म का आड़ लेकर लगातार औरतों का शोषण करते रहते हैं. देश में कई ऐसी कुप्रथाएं हैं जो हिन्दू धर्म की आड़ में संभ्रात वर्ग को दलित और पिछड़ी औरतों के शोषण का हक देती है. देवदासी प्रथा ऐसी ही एक घिनौनी कुप्रथा है. तमाम कानूनों के बावजूद दक्षिण में इस कुप्रथा का खूब प्रचलन है. ये प्रथा आन्ध्रप्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक सहित महाराष्ट्र में ज्यादा फला-बढ़ा है.
सन् 1982 में सरकार ने इस कुप्रथा पर बैन लगा दिया  था. 2004 में महाराष्ट्र सरकार ने इसके खिलाफ एंटी देवदासी बिल भी पास किया, मगर इसके बावजूद सामाजिक संगठनों की माने तो ये प्रथा हमारे देश में आज भी विद्यमान है. शाब्दिक तौर पर देवदासी का अर्थ होता है, देवता (भगवान) की दासी. प्राचीन भारत में कुंवारी लड़कियों की शादी भगवान से कराकर उन्हें मन्दिर की सेवा करने के लिए दे दिया जाता था. उनका कार्य नृत्य औऱ संगीत द्वारा भगवान की सेवा करना होता था. लेकिन असल में इनका काम मंदिर के पुजारियों, गांव के जमींदारों, पैसे और पावर वाले लोगों की कामेच्छा की पूर्ति करना रह गया. आंकड़ों की बात करें तो तकरीबन साढ़े चार लाख देवदासियां मजबूरीवश धर्म की आड़ में चलने वाले इस घिनौने खेल में लिप्त हैं.  इस प्रथा के पीछे मुख्य कारण निर्धनता है. देश के दक्षिण  भाग में निर्धन लोग लड़की को एक अतिरिक्त बोझ के रूप में देखते हैं. उन्हें लगता है कि लड़की के जन्म से उनके घर खाने वालों की संख्या बढ़ जाएगी इसलिए वे अपनी लड़कियों को इस कुप्रथा की अग्नि में झोंक देते हैं. इससे जहां उनकी आमदनी बढ़ जाती है तो वहीं खाने वाले की संख्या भी नहीं बढ़ती. ये प्रथा दलितों में ज्यादा पाई जाती है क्योंकि इनकी स्थिति समाज में बहुत ही नीचे है और उनमें शिक्षा की कमी पाई जाती है. अगर वो इस कुप्रथा के भंवर से निकलना चाहे तो उन्हें ऐसी सजा दी जाती है जिससे कोई दूसरी देवदासी ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा सके.
अलग-अलग जगहों पर इसे अलग-अलग नाम दिया गया है. मसलन आंध्र प्रदेश में इसे जोगिनी, गोवा में भावनिस, तामिलनाडु में थेवारदियर, महाराष्ट्र में मुरालिस असम में नतिस, कर्नाटक में बेसविस कहा जाता है. मराठी में तो इनके बारे में कहा जाता है कि ये दासी तो भगवान की होती है परंतु पत्नी सारे शहर की होती है. इस तरह की बहुत सी औरते हैं जो आजीवन कुंवारी रहती हैं और भीख मांग कर अपना गुजारा करती हैं. वो भी आम भिखारियों की तरह नहीं बल्कि एक प्रथा जिसे 'जोगवा' कहते हैं, उसके तहत. इसमें इनके पैरों में छोटी घंटियां बंधी होती है. साथ ही भगवान का धातु का बना एक मुखौटा होता है, जिसे सर पर रखकर ये आजीवन भीख मांगती हैं. कर्नाटक में बूढ़ी देवदासियों को 'जोगतितथा कम उम्र की देवदासियों को 'बेसवी' कहा जाता है. 'बेसवी' शब्द बेसवा नाम के बैल से लिया गया है, जिसका मतलब होता है ऐसा बैल जो पूरे गांव में बिना किसी रोक-टोक के घूमता है. ओकली नाम की ऐसी ही एक कुप्रथा 1987 तक प्रचलन में थी. यह हिन्दू नववर्ष (गुड़ी पड़वा) के बाद पहले या दूसरे शनिवार को आता था. इसमें देवदासियों के साथ सार्वजनिक तौर पर संबंध बनाया जाता था. बाद में इस प्रथा को 'रंगपंचमी' का नाम दे दिया गया. इस दौरान इस प्रथा के जरिए और ज्यादा फूहड़ता के साथ देवदासियों का शोषण होने लगा. संभ्रांत परिवार के युवक इसमें शामिल होते थे. ये सब घिनौना खेल 'भगवान बिलि कलप्पा' के नाम पर होता था. कर्नाटक के एक शहर मदकेरिपुरा में 'सिदि अत्तु' नाम की प्रथा का चलन 1987 तक रहा, जब तक की वहां की सरकार ने इसे बैन नहीं कर दिया. इस प्रथा के तहत देवदासियों के पीठ में हुक लगाकर मैदान में एक खंभे पर टांग दिया जाता था. इस दौरान उसके शरीर का अधिकांश हिस्सा दिखता रहता जिससे लोगों का मनोरंजन होता. यह सारा घिनौना खेल उस शहर की सम्पन्नता के नाम पर किया जाता था. इसके बदले में भीड़ उसे साड़ी, नारियल और सुपारी देती. प्रथा के मुताबिक सार्वजनिक रूप से इतना अपमान झेलने के बावजूद उसे लोगों का धन्यवाद करना पड़ता था.
गौर करें तो हिन्दू धर्म के पुरोधा दलितों एवं पिछड़ों को अपने मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से तो रोकते हैं लेकिन इस समाज की महिलाओं का भगवान के नाम पर लगातार शोषण करते रहते हैं. हिन्दू कोड बिल के जरिए भारतीय स्त्रियों की दशा सुधारने की दिशा में नींव रखने वाले डॉ. आम्बेडकर ने 13 जून, 1936 में मुंबई के परेल स्थित दामोदर हॉल में देवदासियों का एक सम्मेलन आयोजित किया था. इसमें उन्होंने कहा कि उन्हें इस पाप भरी जिन्दगी को छोड़कर एक सही जिंदगी जीनी चाहिए, जहां चरित्र पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो. इस दौरान उन्होंने देवदासी प्रथा में लिप्त महिलाओं को बौद्ध धम्म की दीक्षा देकर उनके परिवार को इस प्रथा से मुक्त किया. हालांकि आज भी देश में कई राज्य ऐसे हैं, जहां धर्म के नाम पर संभ्रात लोगों द्वारा पिछड़ी और दलित महिलाओं का शोषण बरकरार है.

मासिक पत्रिका 'दलित दस्तक' के मई अंक में प्रकाशित मेरा आर्टिकल